वे महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी) के द्वितीय पुत्र गोस्वामी गोविन्दराय जी के पौत्र और गोस्वामी कल्याणराय जी तथा श्रीमती यमुना बहूजी के पुत्र थे।
श्री हरिराय जी का अधिकांश जीवन गोकुल में ही बीता जहाँ वे सं. १७२६ तक रहे। सं. १७२६ में तत्कालीन मुग़ल शासक औरंगज़ेब की अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णुता की नीतियों के कारण पुष्टि संप्रदाय के सेव्य स्वरूप श्रीनाथजी को जतीपुरा और गोकुल से नाथद्वारा में स्थानांतरित किया गया।
साहित्यिक अवदान-
श्री हरिराय जी का साहित्यिक अवदान विपुल और अमूल्य है, जिनमें कई भाषाओँ में लिखे गए उनके ग्रन्थ व अन्य रचनाएं शामिल हैं। उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, ब्रजभाषा, पंजाबी, मारवाड़ी, एवं गुजराती आदि भारतीय भाषाओँ में लगभग 300 ग्रंथों की रचना की है। इनमें से १६६ ग्रन्थ संस्कृत भाषा में हैं।