आप श्री जब वहां बिराज रहे थे तो अर्धरात्री को वह ब्रह्मपिशाच निकला । उसी समय एक वैष्णव धोती धोकर अपरस सुरखा रहा था । आपने वही जल ब्रह्मपिशाच पर छिरका जिससे वह मुक्त हो, दिव्य शरीर धारण कर बैकुंठ को गया। इस प्रकार आपकी कृपा से सुरभि कुंड पर निर्भयता हुई।