षोडश ग्रंथ

श्री महाप्रभुजी वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित (भाष्य)

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1.ब्रह्मसूत्र अनु भाष्यम् भाग 1 / अध्याय 1

पता: श्रीनाथजी की हवेली, नाथद्वारा, जिला राजसमंद, राजस्थान

श्री वल्लभाचार्यजी द्वारा रचित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो वेदान्त के गूढ़ सिद्धांतों की पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण से व्याख्या करता है। इसे "अनुभाष्यम्" इसलिए कहा गया क्योंकि यह स्वयं महाप्रभुजी के अनुभव और ज्ञान पर आधारित है।

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2.ब्रह्मसूत्र अनु भाष्यम् भाग 2

पता: श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा, जिला राजसमंद, राजस्थान

श्री वल्लभाचार्यजी का अत्यंत गूढ़ ग्रंथ है, जो वेदान्त सूत्रों (Brahmasutras) के दूसरे अध्याय की पुष्टिमार्गीय दृष्टिकोण से व्याख्या करता है। भाग 2 में वे उन शास्त्रीय आपत्तियों और दूसरे दर्शनों के मतों का उत्तर देते हैं जो ब्रह्म के स्वरूप, सृष्टि के कार

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3.ब्रह्मसूत्र अनु-भाष्यम् – भाग 3 / अध्याय 2

पता: श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा

श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा लिखित एक अत्यंत गूढ़ वेदान्त ग्रंथ है। यह ग्रंथ ब्रह्मसूत्र के द्वितीय अध्याय के उत्तरार्ध (भाग 3) की व्याख्या करता है और उसमें वे भिन्न-भिन्न मतों, सृष्टि के तात्त्विक कारणों, और भ्रम-विनाश पर गंभीरता से विचार करते हैं।

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4.श्रीमद् ब्रह्मसूत्राणुभाष्यम् – भाग 4 / अध्याय 3

पता: नाथद्वारा (श्रीनाथजी मंदिर)

श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित शुद्धाद्वैत वेदान्त की उत्कृष्ट व्याख्या है, जिसमें उन्होंने जीव की गति, उपासना, और ब्रह्मज्ञान की विधियाँ स्पष्ट की हैं। यह भाग ब्रह्मसूत्र के तीसरे अध्याय पर आधारित है।

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5.ब्रह्मसूत्राणुभाष्यम् – भाग 5 / अध्याय 4

पता: श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा,

यह अंतिम अध्याय है जिसमें "मोक्ष", ब्रह्म की प्राप्ति, तथा मुक्त जीव की स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।यह मुक्ति जीव के स्वरूप की पूर्णता है — ब्रह्म में लीन होकर विलीन नहीं होता, बल्कि प्रेम और सेवा से युक्त रहता है।

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6.अनुभाष्य प्रदीप विवरण – अध्याय 1

पता: श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा

अनुभाष्य-प्रदीप-व्याख्यान श्री गोसाईं श्री हरिरायजी महाराज द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो शुद्धाद्वैत वेदांत में ब्रह्मसूत्र अनु भाष्य पर विस्तृत टिप्पणी करता है। यह "प्रदीप" की तरह कार्य करता है — जो गूढ़ सूत्रों पर प्रकाश डालता है।